IPC क्या होता है आईपीसी की फुल फॉर्म?

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IPC क्या होता है आईपीसी की फुल फॉर्म?
IPC क्या होता है आईपीसी की फुल फॉर्म?

नमस्कार दोस्तों आज हम लोग जानेंगे आईपीसी के बारे में.आप लोगों ने तो IPC का नाम जरुर सुना होगा, जब भी आप लोग कोर्ट कचहरी या वकील से मिलने जाते हैं तो आईपीसी का नाम जरूर सुनने में आया होगा  मगर शायद आप लोग जानते होंगे आईपीसी के बारे में.  IPC होता क्या है और IPC का मतलब क्या होता है. तो आज हम लोग इसी के बारे में जानेंगे तो चलिए जानते हैं?IPC क्या होता है आईपीसी की फुल फॉर्म?

IPC क्या होता है

भारतीय दण्ड संहिता भारत देश के अन्दर भारत के किसी भी नागरिक द्वारा किये जाने वाले अपराधों की परिभाषा व दण्ड का प्रावधान करती है। किन्तु यह IPC भारत की सेना पर लागू नहीं होती। अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू एवं कश्मीर में भी अब भारतीय दण्ड संहिता (IPC) लागू है IPC में कुल 511 धाराऐ हैं जिन्हें 23 चैप्टर में परिभाषित किया गया है. IPC का फुल फॉर्म INDIAN PANEL COURT होता है इसे हिंदी में भारतीय दंड संहिता कहते हैं. भारत देश में होने वाले सभी अपराधों एवं सजा का प्रावधान IPC यानी भारतीय दंड संहिता ही करती है.

भारतीय दंड संहिता में कुल 511 धाराएं जिन 23 चैप्टर में मूल्यांकन किया गया है. तो जानते हैं IPC की पहली धारा क्या कहती है तो चलिए जानते हैं? दरअसल भारतीय दंड संहिता की पहली धारा 1 के बारे में संपूर्ण जानकारी देती है साफ तौर पर कहे तो यानी कि यह धारा भारतीय दंड संहिता के विस्तार को प्रभावित करती है और यह धारा कहा-कहा लागू होता है उसकी जानकारी देती है. IPC धारा 1 भारतीय दंड संहिता के वर्णन करती है.

IPC की आखिरी धारा यानी की धारा 511. यह धारा यह बतलाती है कि अगर कोई शख्स किसी व्यक्ति को चोट पहुंचाने की कोशिश करती है और कोशिश करने के बावजूद कामयाब नहीं हो पाता, ऐसे ही कोई व्यक्ति चोरी करने की कोशिश करता है और वह कामयाब नहीं हो पाता तो इस तरह की कोशिश करने के लिए आईपीसी में कोई प्रावधान तो नहीं है लेकिन ऐसा नाकाम कोशिश करने वाले को दोषी पाए जाने पर लंबी अवधि के लिए जेल या फिर जुर्माना की सजा दे सकती है, यह अपराध समझौता करने योग्य नहीं है.

IPC की धारा कब लागू हुई थी

1834 में स्थापित भारत के पहले ब्रिटिश कानून आयोग की सिफारिशों पर 1860 में कोड का मसौदा तैयार किया गया था। यह भारत का प्रमुख आपराधिक कोड है जो अपराधों को परिभाषित करता है और लगभग सभी प्रकार के आपराधिक और कार्रवाई योग्य गलतियों के लिए दंड प्रदान करता है। इसके बाद इसे भारतीय दंड संहिता के दौर पर 1 जनवरी 1862 को लागू किया गया था. मौजूदा दंड संहिता को हम लोग भारत के दंड संहिता को 1860 के नाम से जानते हैं

थॉमस मैकाले को “भारतीय दंड संहिता के जनक” के रूप में जाना जाता है। और यह भारत में आपराधिक कानूनों को संहिताबद्ध करने के लिए पहले विधि आयोग द्वारा तैयार किया गया था, जिसकी अध्यक्षता इन्होंने की थी

भारतीय दंड संहिता का इतिहास एवम महत्पूर्ण जानकारी 

भारतीय दंड संहिता की जड़ें अपने देश में ब्रिटिश शासन के समय में हैं. ऐसा माना जाता है कि भारतीय दंड संहिता IPC की शरुआत 1860 में अपनी औपनिवेशिक विजय के ब्रिटिश विधान खाते से हुई थी. ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा भारतीय दंड संहिता का ड्राफ्ट तैयार करने से पहले, भारत में मुस्लिम कानून प्रभावी था.

1834 में, थॉमस मैकाले के नेतृत्व में प्रथम विधि आयोग ने 1833 के चार्टर अधिनियम के तहत भारतीय दंड संहिता का ड्राफ्ट तैयार किया, जिसे 1837 में भारत के गवर्नर-जनरल काउंसिल को प्रस्तुत किया गया था, लेकिन इसे फिर से संशोधित किया गया.

उसके बाद एक ब्रिटिश शासक बार्न्स पीकॉक जो बाद में कलकत्ता उच्च न्यायालय के पहले मुख्य न्यायाधीश बने, इसके द्वारा सावधानीपूर्वक संशोधन के बाद अंततः 6 अक्टूबर, 1860 को इसे कानून में पारित कर दिया गया और इस संहिता को 1 जनवरी, 1862 से पुरे देश में लागू हो गया. उसके बाद समय बदलते धीरे-धीरे संशोधन होता गया. 

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