गणेश जी को तुलसी क्यों नहीं चढ़ाई जाती है?

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गणेश जी को तुलसी क्यों नहीं चढ़ाई जाती है?
गणेश जी को तुलसी क्यों नहीं चढ़ाई जाती है?

दोस्तों तुलसी के महत्व और पवित्रता के विषय में हम सभी जानते हैं. भगवान श्री कृष्ण को अति प्रिय होने के कारण उनको अर्पित किए जाने वाले हर भोग  में तुलसी का पत्ता रखा जाता है. आयुर्वेद के अनुसार तुलसी का पत्ता एक बहुत ही महत्वपूर्ण चिकित्सक में काम करते हैं इसमें अनेकों औषधीय गुण पाए जाते हैं. एक तुलसी का पत्ता प्रतिदिन खाने से शरीर के अनेकों रोग नष्ट हो जाते हैं परंतु जब गणेश जी की पूजा की बात आती है तो उसमें तुलसी का पत्ता नहीं बल्कि उसमें घास का उपयोग होता है. गणेश पूजा में तुलसी अर्पित करना वर्जित माना गया है इतनी लाभकारी एवं पवित्र तुलसी गणेश जी को क्यों अर्पित नहीं की जाती है आज हम लोग इसी  बारे में जानेंगे तो चलिए जानते है.गणेश जी को तुलसी क्यों नहीं चढ़ाई जाती है?

गणेश जी को तुलसी क्यों नहीं चढ़ाई जाती है?

दोस्तों गणेश जी को तुलसी अर्पित नहीं करने के कारण इसके पीछे एक बहुत बड़ी पौराणिक कहानी है तो चलिए जानते है कि वह क्या कारण है जिसके कारण गणेश जी की पूजा में तुलसी अर्पित करना पाप माना गया है. एक पौराणिक कथा के अनुसार एक बार गणेश जी गंगा के किनारे तपस्या कर रहे थे, तब दूसरी ओर तुलसी अपने विवाह की इच्छा लिए हुए तीर्थ यात्रा पर निकली. तब रास्ते में तुलसी ने भगवान गणेश को तपस्या में लीन देखा.

जो कि पूरे शरीर पर चंदन का लेप लगाए हुए और कमर में पितांबर पहनें हुए, गले में पारिजात पुष्पों और 7 रत्नों का हार धारण किए हुए थे. गणेश जी को देखकर तुलसी उन पर मोहित हो गई और उनके समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा. जिससे गणेश जी का ध्यान भंग हो गया और उन्हें यह बात बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगी. और तुलसी के द्वारा किए गए इस कृत को अशुभ बताकर स्वयं को ब्रह्मचारी बताकर विवाह के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया.

तुलसी और गणेश जी की कथा 

इससे तुलसी को बहुत दुख हुआ और उन्होंने क्रोध में आकर तुलसी ने गणेश जी को श्राप दिया कि उनका विवाह उनकी इच्छा के अनुसार नहीं होगा. क्योंकि गणेश जी ने स्वयं को ब्रह्मचारी बताया था इसलिए तुलसी ने उसे यह भी श्राप दिया कि उनके दो विवाह होंगे. इस पर गणेश जी भी क्रोध में आकर तुलसी को श्राप दिया कि उनका विवाह एक असुर से होगा. एक राक्षस से विवाह की बात सुनकर तुलसी सहन नहीं कर पाई और उन्हें अपनी गलती समझ में आ गई और उन्होंने गणेश जी से क्षमा मांगी.

गणेश जी का जब क्रोध शांत हुआ तो उन्होंने तुलसी से कहा कि तुम्हारा विवाह शंखचुड़ (जालंधर ) नामक राक्षस से होगा, श्राप पूर्ण होने पर तुम भगवान श्री कृष्ण को अत्यंत प्रिय मानी जाएगी और कलयुग में तुम्हारा महत्व इतना अधिक होगा कि तुम लोगों को जीवन और मोक्ष देने वाली होगी , परंतु मेरी पूजा में तुम्हें अर्पित करना शुभ नहीं माना जाएगा. तभी से भगवान श्री गणेश की पूजा में तुलसी के पत्ते का प्रयोग अशुभ माना जाता है.

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