गरुड़ पुराण:- मृत्यु समीप आने पर इंसान को क्या करना चाहिए?

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मित्रों जैसा कि हम सभी जानते हैं कि हम सभी को एक न एक दिन इस शरीर को त्यागना ही है यानी एक न एक दिन हम सभी को मरना ही है। मौत से हम मनुष्यों को तो वैसे ही डर लगता है लेकिन हर मनुष्य मृत्यु से जुड़े रहस्यों को जानने के लिए उत्सुक रहता है। मनुष्य जब भी किसी की मृत्यु का नाम सुनता है या फिर उसके आसपास जब भी किसी की मृत्यु हो जाती है तो फिर भी सोचने लगता है कि मृत्यु के बाद मरने वालों के साथ क्या होता होगा या मृत्यु से पहले डर लगा होगा कि नहीं। इस रहस्य को सुलझाना इतना आसान नहीं है हालांकि गरुड़ पुराण में मृत्यु के बाद की घटना के बारे में काफी कुछ विस्तार से बताया गया है। आज की इस पोस्ट में हम बात करेंगे की गरुड़ पुराण के अनुसार अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु नजदीक आ जाए तो उसके साथ क्या करना चाहिए।

किसी की मृत्यु नजदीक हो तो क्या करें?

 गरुड़ पुराण – अध्याय नौवा

गरुड़ पुराण के नौवें अध्याय में वर्णित कथा के अनुसार एक बार पक्षीराज गुरुर ने भगवान विष्णु से पूछा कि-  हे नारायण कृपा करके यह बताइए कि अगर किसी व्यक्ति का अंत समय निकट हो तो उसके साथ क्या करना चाहिए? तब भगवान विष्णु ने गरुड़ जी से कहा कि – हे पक्षीराज जब अंत समय में प्राणी अपना शरीर छोड़ने लगता है तो परिवार को चाहिए कि आंगन में तुलसी के समीप गोबर से एक मंडल की रचना करें। उस मंडल पर पहले तिल बिखेर दें और फिर कुश को बिछा दे, उसके बाद उसके ऊपर पर श्वेत यानी कि सफेद वस्त्र के आसन पर शालिग्राम शिला को स्थापित करें। वेदों में बताया गया है कि शालिग्राम पाप, दोष और भय को हर लेते हैं इसीलिए शालिग्राम के समीप मरने से प्राणी की मुक्ति सुनिश्चित है। इतना ही नहीं जहाँ जगत के ताप का हरण करने वाली तुलसी वृक्ष की छाया है वह मरने से सदैव मुक्ति ही होती है।

भगवान विष्णु गुरुड़ को बताते हुए कहते है कि हे गरुड़ जिसके आंगन में तुलसी लगा हुआ है वह घर तीर्थ के समान है वहां यमदूत प्रवेश नहीं करते है। तुलसी के पत्तों से युक्त होकर जो प्राणी अपने प्राणों का परित्याग करता है तो यमराज उसे देख नहीं सकते भले ही वह अपने जीवन में सैकड़ो पाप क्यों ना किया हो। इतना ही नहीं तुलसी के पत्तों को मुख में रख कर तिल और कुश के आसन पर मरने वाला व्यक्ति पुत्र हीन भी हो तो भी वह निसंदेह बैकुंठ को जाता है। उसके बाद गोबर से लिपी हुई और कुश बिछाकर संस्कार की हुई पृथ्वी पर मरणासन्न व्यक्ति को स्थापित करना चाहिए। मरणासन्न  व्यक्ति को चौकी पर नहीं रखना चाहिए क्योंकि मेरे सहित ब्रह्मा, रुद्र अन्य देवता उस मंडल पर विराजमान रहते हैं इसलिए गोबर से मंडल की रचना करनी चाहिए।

जो भूमि लेप सहित होती है अर्थात मल-मूत्र आदि से रहित होती है वे सर्वत्र पवित्र होती है किंतु जो भूमि मल- मूत्र आदि से दूषित है वहां पुनः गोबर से लेपने पर शुद्धि हो जाती है। बिना लेपी हुए भूमि पर और चारपाई पर भूत-प्रेत, पिचास, राक्षस और यामदूत प्रविष्ट हो जाती है इसलिए भूमि पर मंडल बनाए बिना अग्निहोत्र,श्राद्ध, ब्राह्मण भोजन, देवपुजन, और आतुर (मरणासन्न) व्यक्ति का स्थापन नहीं करना चाहिए इसलिए लेपि भी भूमि पर मरणासन्न  व्यक्ति को लिटा कर उसके मुख में स्वर्ण और रत्न देना चाहिए। जो शालिग्राम शिला के जल को बिंदु मात्र भी पीता है वे सभी पापों से मुक्त होकर बैकुंठ लोक में जाता है इसलिए मरणासन्न व्यक्ति को महापातक को नष्ट करने वाले गंगाजल को देना चाहिए।

गंगाजल का पान सभी तीर्थों में किए जाने वाले स्नान दान आदि के समान माना गया है जो शरीर को शुद्ध करने वाले चंद्रायण व्रत को एक हजार बार करता है और जो गंगाजल का एक बार पान करता है वे दोनों समान फल वाले रहते हैं। आगे कहते हैं हे पक्षीराज अग्नि के संबंध में जैसे रुई की राशि नष्ट हो जाती है उसी प्रकार गंगाजल से पातक भस्मसात हो जाते हैं। इतना ही नहीं अन्य नदियां मनुष्यों को स्नान करने पर पवित्र करती है किंतु गंगा जी तो दर्शन, स्पर्श, दान अथवा उनका कीर्तन करने मात्र से सैकड़ों-हजारों पुण्य रहित पुरुषों को भी पवित्र कर देती है। इसलिए इस संसार से पार लगाने वाले गंगाजल को मरणासन्न व्यक्ति को पिलाना चाहिए।

जो व्यक्ति प्राणों के कंठ गत होने पर गंगा गंगा कहता है वे विष्णु लोक को प्राप्त होता है और पुनः भूलोक में जन्म नहीं लेता। इसके अलावा प्राणों के निकलने तक जो प्राणी मन से और श्रद्धा युक्त से गंगा का चिंतन करता है वह भी परम गति को प्राप्त होता है अतः गंगा का ध्यान, गंगा का नमन, गंगा का स्मरण और गंगा जल का पान करना चाहिए। इसके बाद मोक्ष प्रदान करने वाली श्रीमद्भागवत कथा को जितना हो सके श्रवण करना चाहिए। जो व्यक्ति अंत समय में श्रीमद्भागवत के एक श्लोक या आधे श्लोक अथवा एक पाठ का भी पाठ करता हो अथवा उसको सुनता है तो वे ब्रह्म लोक को प्राप्त होकर पुनः संसार में कभी नहीं आता है।

इसके बाद भगवान विष्णु गुरुड़ से कहते हैं – हे खग प्राण त्यागने के समय मनुष्य को अन्न तथा जल का त्याग कर देना चाहिए और यदि वह विरक्त तथा द्विजन्मा हो तो उसे आतुर संन्यास लेना चाहिए। प्राणों के कंठ में आने पर जो प्राणी “मैंने सन्यास ले लिया है” ऐसा कहता है उसे विष्णु लोक की प्राप्ति होती है और पुनः पृथ्वी पर उसका जन्म नहीं होता। इस प्रकार हे खग जिस धार्मिक पुरुष के अतुरकालिक पूर्वउक्त कार्य संपादित किए जाते हैं उसके प्राण ऊपर के छिद्रों से सुख पूर्वक निकलते हैं जैसे मुख,दोनों नेत्र, दोनों नासिकारंन्ध, दोनों कान ये 7 ऊपर के द्वार इनमें से किसी द्वार से पुण्यात्मा के प्राण निकलते हैं और योगियों के प्राण तालूरंध्र से निकलते हैं। अपान से मिले प्राण जब पृथक हो जाते हैं तब प्राण वायु सूक्ष्म होकर शरीर से निकलता है।

प्राणवायु रूपी ईश्वर के निकल जाने पर काल से आहत शरीर निराधार वृक्ष की भाँति गिर पड़ता है। प्राण से मुक्त होने के बाद शरीर तुरंत चेष्टाशून्य, घृणित, दुर्गन्धयुक्त, अस्पृश्य और सभी के लिए निन्दित हो जाता है। इस शरीर की कीड़ा, वीष्ठा तथ भस्मरूप – ये तीन अवस्थाएँ होती हैं, इसमे कीड़े पड़ते हैं, यह विष्ठा के समान दुर्गन्धयुक्त हो जाता है अथवा अन्तत: चिता में भस्म हो जाता है। इसलिए क्षण मात्र में नष्ट हो जाने वाले इस देह के लिए मनुष्यों के द्वारा गर्व क्यों किया जाए। पंचभूतों से निर्मित इस शरीर का पृथ्वी तत्व पृथ्वी में लीन हो जाता है, जलतत्व जल में, तेजस्तत्त्व तेज में और वायुतत्व वायु में लीन हो जाता है, इसी प्रकार आकाश तत्व भी आकाश में लीन हो जाता है। सभी प्राणियों के देह में स्थित रहने वाला, सर्वव्यापी, शिवस्वरुप, नित्य मुक्त और जगत्साक्षी आत्मा अजर-अमर है।

सभी इन्द्रियों से युक्त और शब्द आदि विषयों से युक्त (मृत व्यक्ति की देह से निकला) जीव कर्म-कोश से समन्वित तथा काम और रोगादि के सहित – पुण्य की वासना से युक्त होकर अपने कर्मों के द्वारा निर्मित नवीन शरीर में उसी प्रकार प्रवेश करता है जैसे घर के जल जाने पर गृहस्थ दूसरे नवीन घर में  प्रवेश करता है। तब किंकिणी जाल की मालाओं से युक्त विमान लेकर सुन्दर चामरों से सुशोभित देवदूत आते हैं। धर्म के तत्व को जानने वाले, बुद्धिमान, धार्मिक जनों के प्रिय वे देवदूत कृतकृत्य इस जीव को विमान से स्वर्ग ले जाते हैं। सुन्दर, दिव्य देह धारण करके निर्मल वस्त्र और माल्य धारण करके, सुवर्ण और रत्नादि के आभरणों से युक्त होकर वह महानुभाव जीव दान के प्रभाव से देवताओं से पूजित होकर स्वर्ग को प्राप्त करता है।

।।इस प्रकार गरुड़ पुराण के अन्तर्गत सारोद्धार में “म्रियमाणकृत्यनिरुपण” नामक नवाँ अध्याय पूरा हुआ।।

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