गूलर के फल में कीड़े क्यों लगते हैं जाने इसका पौराणिक कारण ?

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गूलर का फल

दोस्तों गर्मी के दिनों में हरे एवं लाल रंग के गोल गूलर के फल सब को अपनी और आकर्षित करते रहते हैं और जब इन फूलों को तोड़कर खाने की कोशिश करते हैं तो उसे तोड़ने के बाद अंदर से कई छोटे-छोटे कीड़े उसमें दिखाई देने लगता है जिसके बाद हम लोग उसे फेंक देते है और फिर उसे देखने का भी मन नहीं करता है, तब फिर हमारे मन में एक सवाल उठता है कि इस फल के अंदर में इतने सारे कीड़े आए किधर से, जो कि यह फल बाहर से ना तो टूटा हुआ है ना इसमें किसी प्रकार का छेद है तो इस फल के अंदर कीड़े प्रवेश कैसे किए। इसी सवाल का जवाब आज हम लोग इस पोस्ट मे जानेंगे कि इसका मूल कारण क्या है तो चलिए हम लोग जानते हैं।गूलर के फल में कीड़े क्यों लगते हैं जाने इसका पौराणिक एवं वैज्ञानिक कारण?

गूलर के फल में कीड़े क्यों लगते हैं जाने इसका पौराणिक  कारण –

हिंदू धर्म ग्रंथों में गूलर के फल से जुड़ी एक पौराणिक कथा भी सामने आती है इसमें हमें गूलर के फल में उपस्थित कीड़े का राज के बारे में पता चलता है तो चलिए जानते हैं इसके बारे में। प्राचीन युग में भक्त प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यप का शासनकाल हुआ करता था। जो बहुत ही क्रूर एवं दुष्ट शासक था उनके राज्य में सिर्फ अधर्म का ही शासन काल था। जो भी लोग धर्म के मार्ग पर चलते वह उनका  हत्या कर देता था। हिरण्यकश्यप को वरदान था कि वह किसी भी अन्य देवता, मनुष्य,पशु पक्षी, दिन-रात  कोई भी उसे मार नहीं सकता है। वह अपने इस वरदान के चलते हैं अपने आप को वह अहंकार में भगवान समझने लगा तथा प्रजा से अपनी पूजा करवाने लगा।

असुर राज हिरण्यकश्यप का शासन बहुत कठोर था यहां तक कि देवता, यक्ष, गंधर्व सभी उसे शत्रुता मोल लेने से डरते थे। वह धर्म के मार्ग पर चलने वाले प्रजा एवं विष्णु भक्तों को कठोर दंड देता था, उनका यह अधर्म का शासन दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था। उनके शासन से सभी लोक एवं लोकपाल घबरा गए और सभी नारायण के शरण में गए। देवताओं की स्तुति सुनकर भगवान विष्णु ने देवताओं को हिरण्यकश्यप वध का आश्वासन दिया। तब भगवान विष्णु ने अपने एक भक्त को हिरण्यकश्यप के पुत्र के रूप में भेज दिया जिसका नाम प्रह्लाद था जो भगवान विष्णु के परम भक्त निकला।

 प्रह्लाद एवं भगवान विष्णु की कथा

प्रह्लाद दिन-रात भगवान विष्णु की स्तुति एवं पूजा अर्चना एवं भजन करता रहता था जिस पर उसके पिता हिरण्यकश्यप को बहुत क्रोध आया कि वह मुझे भगवान ना मानकर विष्णु को भगवान मानता है। इस पर हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रह्लाद को मारने के लिए कई प्रकार के यातनाएं दी, फिर भी प्रहलाद भगवान विष्णु की भक्ति के कारण बार-बार बच गया। इन सब देखने के बाद हिरण्यकश्यप के क्रोध की कोई सीमा नहीं रही और वह प्रह्लाद से कहने लगा कि उदंड बालक तू किसके बल पर मेरी आज्ञा के विरुद्ध जा रहा है

तब प्रहलाद ने विनम्रता पूर्वक अपने पिता हिरण्यकश्यप से कहा कि – हे पिताश्री जो तीनो लोको,14 भुवनों, जो सृष्टि के कण-कण में, पेड़-पौधे, मनुष्य, जीव जंतु, यहां तक कि ब्रह्मा आदि संपूर्ण देवों में जो अविनाशी परमात्मा वास करते हैं मैं उसी नारायण की भक्ति करता हूँ, वह परमेश्वर ही अपनी शक्ति के द्वारा इस संपूर्ण सृष्टि की रचना, पालन एवं संघार करता है। आप भी अपने मन को उस परमेश्वर ने लगाइए से जिससे आपका भी जीवन सफल होगा।

गूलर के फल में कीड़े क्यों लगते हैं जाने इसका पौराणिक कारण ?

यह बात सुनकर हिरण्यकश्यप का शरीर क्रोध से थरथर कांपने लगा और वह पहलाद से कहा कि हे मूर्ख अगर तुम्हारा भगवान सभी जगह है तो इस खंभे में भी होगा तुम्हारा भगवान। तब प्रह्लाद ने कहा हां पिताजी। तब फिर हिरण्यकश्यप ने अपनी गदा से उस खंडे पर दे मारा जिसमें भगवान नरसिंह प्रकट हुए। जिसका आधा शरीर शेर का और आधा मनुष्य का था। तब भगवान नरसिंह ने हिरण्यकश्यप को अपनी जाँघ को पर लेटा कर अपने नाखूनों से उसके पेट फाड़ दिया एवं उसके जीवन लीला समाप्त करके इस संसार से उसके अधर्म का शासन मुक्त किया।

भगवान नरसिंह के नाखूनों में पापी हिरण्यकश्यप का खून लगने के कारण अत्यंत पीड़ा होने लगी उनके हाथों तथा नाखूनों में अत्यंत जलन होने लगा। तब फिर भगवान नरसिंह ने अपने नाखूनों एवं हाथों की जलन शांत करने के उद्देश्य से असुर राज कि खून से लथपथ नाखूनों को भगवान नरसिंह ने वहां पर मौजूद गूलर के पेड़ में अपने नाखूनों एवं हाथ सहित अंदर तक धसा दिया। जिससे उनके नाखूनों हाथों में जलन एवं पीड़ा का निवारण हो गया, लेकिन पापी का खून लगते ही गूलर के वृक्ष के फलों में तभी से कीड़े उत्पन्न होना शुरू हो गया।

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