भगवान शिव और शिवलिंग से जुड़े पौराणिक कथा?

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शंकर भगवान का प्रिय त्यौहार महाशिवरात्रि फाल्गुन मास कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है. हिंदू धर्म में महाशिवरात्रि का एक विशेष महत्व है महाशिवरात्रि पर शिव लिंग को भी पूजा जाता है. देवों के देव महादेव शंकर भगवान से जुड़ी जो सबसे खास बात है वो यह है कि केवल शिव ही है जिन्हें मूर्ति और निराकार लिंग दोनों रुपो में पूजा जाता है.भगवान शिव और शिवलिंग से जुड़े पौराणिक कथा?

भगवान शिव और शिवलिंग से जुड़े पौराणिक कथा?

इस भारतवर्ष में भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग स्थापित है और इनकी पूजा भी होती है. प्रत्येक ज्योतिर्लिंग पर मान्यताओं के अनुसार अभिषेक किया जाता है कहीं पर भस्म से भगवान शिव का राज्याभिषेक होता है तो कहीं पर दूध शहद मक्खन आदि से भी इन्हे पूजा जाता है. अगर भारत के रेडियो एक्टिव मैप को देखा जाए तो आपको यह देखकर हैरानी होगी कि जिन जिन जगहों पर प्राकृतिक रूप से अधिक रेडियो एक्टिविटी है वहीं पर ज्योतिर्लिंग भी बने हुए हैं.

ऐसी मान्यता है कि वास्तव में शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड की ही आकृति है शिवलिंग भी ऊर्जा का स्रोत है. सोमनाथ मंदिर के शिवलिंग में सैयांमनतक नामक पत्थर को हमारे पूर्वजों ने छुपा कर रखा था इसके बारे में यह धारणा है कि यह भी रेडियो एक्टिव ही था. कहते हैं कि मोहम्मद गजनवी ने इस पत्थर को पाने के लिए सोमनाथ मंदिर पर कई बार हमला किया. पत्थर के रेडियो एक्टिविटी के कारण ही लोग सोमनाथ के शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाते थे ताकि विकिरण के प्रभाव को कम किया जा सके यह प्रथा आज भी प्रचलित है.

मान्यता है कि शिवलिंग की पूजा समस्त ब्रह्मांड की पूजा के बराबर मानी जाती है क्योंकि शिव ही समस्त जगत के मूल है. शिवलिंग के शाब्दिक अर्थ की बात की जाए तो शिव का अर्थ है परम कल्याण कारी और लिंग का अर्थ है सर्जन लिंग का अर्थ संस्कृत में चिन्ह या प्रतीक भी होता है इस तरह शिवलिंग हुआ शिव का प्रतीक. भगवान शिव को देव आदि देव भी कहा जाता है जिसका मतलब है कि कोई विलुप्त ना होना. भगवान शिव अनंत काल और सर्जन के प्रतीक है.

शिवलिंग से जुड़े रहस्य

शिवलिंग के संदर्भ में स्कंद पुराण में आकाश को भी लिंग स्वरूप माना गया है. वायु पुराण के अनुसार प्रलय काल में प्रत्येक महायुग की पश्चात समस्त संसार इसी शिवलिंग में मिल जाते हैं और फिर संसार इसी शिवलिंग से सर्जन होते हैं इसीलिए विश्व की संपूर्ण ऊर्जा का प्रतीक शिवलिंग को माना गया है. मूर्ति रूप में शिव की भगवान शंकर के रूप में पूजा होती है शिवलिंग का इतिहास कई हजारों वर्ष पुराना है इस संदर्भ में विभिन्न प्रकार की कथाएं और मान्यताएं हैं.

कहा जाता है कि समुद्र मंथन के समय में विष समाप्त करने के लिए शिव ने सारा विष अपने कंठ में रख लिया था. शिव का कंठ विष पीकर नीले रंग का हो गया यह नीलकंठ कहे जाने लगे लेकिन विष ग्रहण करने के कारण भगवान शिव के शरीर में ताप बढ़ गया उस तरह के सहन के लिए शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा प्रारंभ हुई जो आज भी चलती आ रही है.शिवलिंग को भगवान् शिव का प्रतीक मानकर पूजा जाता है इसकी पूजा विधि विधान से की जाती है.

 शिवलिंग की पूजा क्यों होती है

शिवलिंग के निर्माण को लेकर लिंग महापुराण में वर्णित कथा के अनुसार एक बार भगवान ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठा को लेकर विवाद हो गया. जब उनका विवाद बहुत अधिक बढ़ गया तब अग्नि की ज्वालो में लिपटा हुआ लिंग भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच  एक रूप में प्रकट हुआ . दोनों ही उस लिंग के रहस्य को समझ नहीं पाए. इस रहस्य के बारे में विष्णु भगवान और ब्रह्म देव ने हजारों वर्षों तक खोज की पर फिर भी उन्हें इसका अंत नहीं मिला.

निराश होकर दोनों देव फिर वहीं आ गए जहां पर उन्होंने शुरुआत की थी वहां आने पर उन्हें ओम की ध्वनि सुनाई दी जिसे सुनकर उन्हें अनुभव हुआ कि यह कोई शक्ति है और वह भी वही ओम स्वर की आराधना करने लगे. भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के आराधना से प्रसन्न होकर उस लिंग से भगवान शिव प्रकट हुए उन्होंने उन्हें वरदान दिया और एक शिवलिंग के रूप में स्थापित हो गए यही भगवान शिव का पहला शिवलिंग माना गया है. तभी से भगवान शिव के लिंग के रूप में पूजा करने की परंपरा शुरू होती है.

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