मन क्या है प्राणी को किस प्रकार मायाजाल में बांध कर रखती है – भागवत गीता?

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श्रीमद्भागवत गीता हिंदुओं का पवित्र धर्म ग्रंथ है जिसमें भगवान कृष्ण ने अर्जुन को मानव सभ्यता की भावनाओं से जुड़ी सभी सुख-दुख एवं आत्मज्ञान से जुड़ी सभी सवालों के जवाब दिए हुए हैं। इस ग्रंथ को आप एक मोटिवेशनल किताब के तौर पर भी आप पढ़ सकते हैं जो कि पूरी दुनिया में इससे अच्छी मोटिवेशनल बुक शायद ही आपको मिले। आज की इस पोस्ट में हम मन के बारे में जानेंगे जो की बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न है यह मन ही इंसान को अच्छे बुरे कार्य करवाते हैं अगर इस मन पर किसी का संयम ना हो तो वह व्यक्ति अंधकार में खो जाता है। तो चलिए जानते हैं भगवत गीता की एक कथा के अनुसार जिसमें अर्जुन ने मन के बारे में भगवान श्री कृष्ण से जानने की इच्छा रखी, जिस पर भगवान श्री कृष्ण ने प्राणी के मन के बारे में विस्तार से वर्णन किया है तो चलिए जानते हैं।

 

मन का वर्णन – गीता ज्ञान

भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि – हे पार्थ प्राणी के शरीर का एक अदृश्य अंग है – मन। जो दिखाई नहीं देता परंतु वही शरीर का सबसे शक्तिशाली हिस्सा है। मन शरीर का हिस्सा है उसका आत्मा से कोई संबंध नहीं। आत्मा यदि शरीररूपी रथ में बैठा हुआ रथ का स्वामी है तो मन शरीर रूपी रथ का सारथी है। यह मन ही इंद्रियों के घोड़ों को इधर-उधर भटकता है, कभी यौवन के आवेश में यही चंचल मन मनुष्य को इस भ्रम में डाल देता है कि ” वह सर्वशक्तिमान है वह सब कुछ कर सकता है जिसके आगे हर कोई झुक जाने पर विवश है और वही मन दूसरों पर अत्याचार करने पर उन्हें विवश कर देता।

आगे भगवान श्री कृष्ण अर्जुन कहते कि – जिस तरह दीपक के बाती को दीपक तले अंधेरा दिखाई नहीं देता ठीक उसी तरह यौवन को उसके पीछे छुपा हुआ बुढ़ापा और कमजोरी दिखाई नहीं देती। परंतु जब शरीर के भीतर में यौवन शक्ति का घी जल-जल कर समाप्त होने लगता है और दीपक तले छुपा अंधेरा बढ़ने लगता है तो मनुष्य घबराकर चिल्लाने लगता है कि मैं बीमार हूं और फिर वह रोने लगता है यह रोने का नाटक भी मन ही करता है। हे अर्जुन मनुष्य को ‘मैं’ (अहंकार) का मदिरा पिलाकर मदहोश करने वाला पाखंडी और कोई नहीं यह मन ही है। मन के हाथों में ही मोह माया के जाल है जिसे वह मनुष्य की कामनाओं पर डालता रहता है और वह उसे अपने वश में करता रहता है।

ये मन अपने शरीर से, अपनी खुशियों से, अपने दुखों से  भी मोह करता है। यह मन खुशियों में खुशियों से भरे गीत गाता है तो दुख में दुख भरे गीत गुनगुनाता है, अपने दुख में दूसरों को शामिल करने से उसे खुशी होती है। किसी भी प्राणी को उसका मन जीवन के अंत तक उसके जाल से निकलने नहीं देता उसे अपने वश में बांधकर उसको तरह-तरह की नाच नचाते रहता है, वह जीव को इतनी फुर्सत भी नहीं देता है कि वह अपने अंतर्मन झांक  कर उस परमात्मा के साक्षात्कार कर सके।

आगे भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि – हे पार्थ प्राणी के लिए आवश्यक है कि प्राणी अपने मन को काबू में करके अपने अंतर्मन में उस परमात्मा को देखें तब उस आत्मा के अंदर परमात्मा का प्रकाश स्पष्ट दिखाई देगा उसी को परमात्मा का साक्षात्कार कहते हैं।

आगे अर्जुन श्री कृष्ण से पूछते हैं कि – आप तो कहते हो कि अपने अंतर में झांक कर उस आत्मा को और उस आत्मा में प्रकाशित परमात्मा को पहचानो, अर्थात आत्मा से अलग कोई और है जो आत्मा को पहचानेगा ये किसको कह रहे हो कि आत्मा को पहचानो और कौन पहचानेगा अंतर की आत्मा को? भगवान श्री कृष्ण कहते हैं – मन, तुम्हारा मन है ही इस शरीर के अंदर में उस आत्मा और परमात्मा को पहचानने में मदद करेगा।

अर्जुन भगवान श्री कृष्ण से कहते है – परंतु आप तो कहते हैं कि मन माया के भ्रम जाल में फंसा कर प्राणी को बहुत नाच नाचता है फिर वो आत्मा और परमात्मा की ओर क्यों ले जायेगा? भगवान श्री कृष्ण कहते है – तुमने ठीक प्रश्न किया अर्जुन उसका उत्तर यह है कि जब तक तुम अपने आप को मन और विषयों के अधीन रहने दोगे तब तक वह तुम्हें नाच नचाते रहेगा। हे पार्थ मनुष्य का शरीर एक रथ के भांति है उस रथ के जो घोड़े हैं वह  इंद्रियां समझो जैसे आंख नाक कान मुख और जिव्हा, इन इंद्रियों को जो सारथी चलाता है वह मन है और उस रथ में बैठा हुआ जो रथ का स्वामी है वही आत्मा है। मनुष्य की इंद्रियां अपने विषयों को और आकर्षित होती रहती है और उसका मन इंद्रियों के विषयों की ही ओर दौड़ता रहता है, यह तभी तक हो सकता है जब तक जीवात्मा अपने मन को काबू में ना लाएं। जब तक मन काबू में ना आएगा उसकी इंद्रियां उसके विषयों की ही ओर दौड़ाता रहेगा। विषय उनको बुलाती है और इंद्रियां उनकी तरफ भागती है और मन जीवात्मा की परवाह किए बगैर रथ को उस ओर लिए जाता है परंतु जब तुम स्वयं मन के अधीन न रहकर मन को अपने अधीन कर लोगे तब वही मन एक अच्छे सारथी की तरह तुम्हारे शरीर रूपी रथ को सीधे प्रभु के चरणों मे ले जायेगा। 🙏🙏

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