मृत्यु के बाद दाह संस्कार क्यों किया जाता है :- गरुड़ पुराण?

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जैसा कि आप सभी जानते हैं कि इस दुनिया में अगर कोई बात सत्य है तो वह है हमारी मृत्यु अर्थात इस पृथ्वी लोक पर जिसने भी जन्म लिया उसे एक न एक दिन मरना ही है। लेकिन सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि मनुष्य इसके बारे में जानते हुए भी इस सत्य से भागता है इसका सबसे बड़ा कारण यह है मनुष्य को मृत्यु के रहस्यों की जानकारी ना होना जिसका वर्णन हिंदू धर्म पुराणों में से एक गरुड़ पुराण में विस्तार से किया गया है। आज हम इस पोस्ट के माध्यम से जानेंगे कि हिंदू धर्म में मृतक के शरीर को जलाया एवं दाह संस्कार क्यों किया जाता है, तो चलिए जानते हैं।

गरुड़ पुराण के धर्म-काण्ड प्रेतकल्प अध्याय में वर्णित कथा के अनुसार इस बात का वर्णन किया गया है कि जब मनुष्य की मृत्यु नजदीक आती है तब उसके शरीर की स्थिति क्या होती है, और साथ ही यह भी बताया गया है कि इंसान की मृत्यु हो जाने के बाद उसके शव के साथ उसके परिवारजनों को कैसा व्यवहार करना चाहिए ताकि मृत आत्मा को जल्द से जल्द मुक्ति मिल सके।

गरुड़ पुराण के प्रेतकल्प अध्याय में पक्षीराज गरुड़ के पूछने पर भगवान श्री हरि कहते हैं कि – हे गरुड़ जब मनुष्य अपने इस जन्म में कर्म करता हुआ मरणासन्न अवस्था में पहुंचता है तब उसके शरीर में कई रोग उत्पन्न होते हैं। मरणासन्न मनुष्य अचानक सर्प की भांति मौत की जकड़न में बंधता चला जाता है परंतु फिर भी मन में जीवन की जीने की इच्छा को लेकर दुखदायी जीवन व्यतीत करता रहता है और फिर अंतिम क्षणों में उसे एक अलौकिक चेतना आती है जिसमें मरणासन्न मनुष्य को सभी लोक एक जैसे ही दिखाई देते हैं।

भगवान श्री हरि गरुड़ से कहते हैं कि जो मनुष्य जीवन में कभी झूठ नहीं बोलता, जो हमेशा अच्छे कर्म करता है, आस्तिक और श्रद्धावान रहता है वह सुख पूर्वक मृत्यु को प्राप्त करता है। वही जो मनुष्य मोह और अज्ञान का उपदेश देता है वह मृत्यु के समय महा अंधकार में फंस जाता है,जो झूठी गवाही देता है या किसी के साथ विश्वासघात करता है या वेदों पुराणों की निंदा करता है वह मूर्छारूपी मृत्यु को प्राप्त करता है। उनको ले जाने के लिए भयानक और भयभीत कर देने वाली दुरात्मा यमदूत आते हैं ऐसी भयंकर परिस्थिति को देखकर प्राणी के शरीर में भय वस कंपन होने लगता है। उस समय वह अपनी रक्षा के लिए अपने माता-पिता पुत्रों आदि रिश्तेदारों को याद करने की कोशिश करता है लेकिन उस पल प्रयास करने पर भी ऐसे जीव के कंठ से एक शब्द भी अस्पष्ट नहीं निकलता है। भयवस प्राणी की आंखें नाचने लगती है, उनकी सांसे बढ़ जाती है और मुंह सूखने लगता है इसके बाद ही वे शरीर का परित्याग करता है।

इसके बाद जब यमलोक पहुंचने पर जीवात्मा जब यमराज को देखकर भयभीत होने लगता है तब यमराज के आदेश से जीवात्मा को पुनः एक बार फिर धरती लोक पर उसी स्थान पर लाकर छोड़ दिया जाता है जहां उसका मृत शरीर रखा हुआ होता है। ऐसे में जीवात्मा वापस आने पर पुनः अपने शरीर में प्रवेश करने की कोशिश करता है परंतु यमदूतो द्वारा पाश में बने होने के कारण वे अपने शरीर में प्रवेश नहीं कर पाता है। ऐसे में उस जीवात्मा को भूख एवं प्यास सताने लगती है और उससे जब यह कष्ट सहन नहीं होता तो फिर वे जोर जोर से रोने लगता है परंतु उसके रोने की आवाज किसी को सुनाई नहीं देती।

अगर किसी मनुष्य की मृत्यु हो जाती है तो दोस्तों आपने भी देखा होगा कि परिवार के लोगों के द्वारा मृतक के शरीर को घर के आंगन में लिपे हुए गोबर से के स्थान पर कुश और तिल रखकर उस पर लेटा दिया जाता है,गरुड़ पुराण में भगवान ने इसके बारे में विस्तार से बताया कि ऐसा क्यों करते हैं?

भगवान श्री हरि कहते हैं कि – जब भी किसी मनुष्य की मृत्यु हो जाए तो उसे घर के आंगन में गोबर से लिप कर उसके ऊपर कुश और तिल बिछाना चाहिए, उसके बाद उस स्थान पर मृत शरीर को लेटाना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से मृत प्राणी अपने समस्त पापों को जलाकर पाप मुक्त हो जाता है। आगे भगवान कहते हैं कि तिल हमारे पसीने से उत्पन्न हुआ है अतः तिल बहुत ही पवित्र है, तिल का प्रयोग करने पर असुर, दानव और प्रेत भाग जाते हैं और कुश मेरे शरीर के रोमो से उत्पन्न हुआ है। कुश के मूल भाग में ब्रह्मा, मध्य भाग में मैं और अग्रभाग में भगवान शिव विराजमान रहते हैं, ये कुश मृत आत्मा को दुर्गति से उद्धार करता है। अगर मृत शरीर को बिना गोबर से लिपी हुई भूमि पर लेटा दिया जाए तो उस मृत शरीर में यक्ष, पिशाच, प्रेत एवं राक्षस कोटि के क्रूर कर्मी दुष्ट प्रविष्ट हो जाते हैं।

मृत शरीर को कुशासन (कुश का आसान ) पर लेटाने  के बाद उसके मुख में पंचरत्न डालना आवश्यक है क्योंकि स्वर्ण अथवा पंचरत्न सभी पापों को जलाकर आत्मा को मुक्ति की ओर ले जाता है अगर ऐसा नहीं किया जाए तो प्रेतात्मा मृत शरीर में प्रवेश कर जाती है। इसके बाद परिवार जनों को चाहिए कि वे मृत आत्मा के मुख में गंगाजल या तुलसी का पत्ता डालें और फिर बिना किसी शोक के उस मृत शरीर के पास भगवान विष्णु का नाम ले। क्योंकि जब भी किसी की मृत्यु होती है तब यमराज अपने दूतों को यह आदेश देते हैं कि जाओ और उस आत्मा को मेरे पास ले आओ जो हरि का नाम नहीं लेते है या फिर उसके नाम का श्रवण न कर रहा हो। इन सब के बाद मृतक के परिवार वालों को चाहिए कि मृतक के शरीर को बांस के बने सैया पर लेटा कर उसे श्मशान ले जाए जहां उसका विधि पूर्वक दाह संस्कार किया जाए। इसके बाद शमशान पहुंचने के बाद मृतक शरीर को जलाने वाली जगह को गोबर से लिप ले और साथ ही यह भी ध्यान रखें कि उस स्थान पर किसी को जलाया गया ना। फिर विधि-विधान से उस चिता का निर्माण कर के उस शव को उस पर रख दे फिर पुत्र,पौत्र या परिवार के किसी सदस्य के द्वारा मृतक को मुखाग्नि दे। जब मृतक का शरीर पूरी तरह से जल जाए तो सभी लोग अपने घर को चले जाये परंतु घर के अंदर प्रवेश करने से पहले सभी स्नान अवश्य कर ले। मृतक के शरीर के दाह संस्कार इसलिए किया जाता है ताकि उसे उसके पूर्वजों के ऋण से मुक्ति मिल सके और उसे पृथ्वी लोक पर भटकना न पड़े।

इसके बाद दोस्तों आप लोग जानते होंगे कि मृतक की आत्मा की शांति के लिए उसके परिवार वालों के द्वारा 10 दिनों की पिंडदान करते हैं और फिर उसका श्राद्ध कर्म किया जाता है जिसे तेरहवीं भी कहा जाता है और ये क्यों किया जाता है जानने के लिए यह पोस्ट पढ़ें 👉 गरुड़ पुराण: – मृत्यु के बाद तेरहवीं क्यों मनाई जाती है,जाने पौराणिक कथाओं के अनुसार?

 

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